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लाइव आप तक न्यूज़ से सम्पादक की ख़ास ख़बर
कोतवाली थाने के सामने कब्रिस्तान का दायरा 36 डिसमिल से 10 डिसमिल पर सिमटा
गोरखपुर थाना कोतवाली शहर के कब्रिस्तानों की पड़ताल के क्रम में कोतवाली थाने के ठीक सामने स्थित ऐतिहासिक कब्रिस्तान की भूमि का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। कभी 36 डिसमिल से अधिक रकबे में फैला यह कब्रिस्तान आज अभिलेखों और जमीनी हकीकत में सिमटकर महज 10 डिसमिल रह गया है, जबकि इसके एक बड़े हिस्से पर अब दो मंजिला व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स खड़ा हो चुका है।
मुतवल्ली' व्यवस्था और 'फसली वर्ष' का गणित-
चूंकि शहर में ज़्यादातर कब्रिस्तान वक़्फ़ है इसलिए पूरे कब्रिस्तानों से जुड़े मामले की जड़ें समझने के लिए दो व्यवस्थाओं को जानना जरूरी है:
मुतवल्ली व्यवस्था की शुरुआत: मुगल काल के दौरान वक्फ संपत्तियों, मस्जिदों, मदरसों और खानकाहों की देखरेख और प्रशासनिक प्रबंधन के लिए नियुक्त व्यक्ति को 'मुतवल्ली' कहा जाने लगा। यह पद इस्लामिक व प्रशासनिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा था, जिसका दायित्व संपत्ति का संरक्षण करना था, न कि उसे निजी मिल्कियत बनाना।
फसली वर्ष क्या है: फसली संवत की शुरुआत मुगल बादशाह अकबर ने 1555-56 ईस्वी (963 हिजरी) में भू-राजस्व और लगान वसूली को सौर चक्र (फसल चक्र) के अनुकूल बनाने के लिए की थी। उत्तर प्रदेश के राजस्व अभिलेखों में आज भी इसी फसली वर्ष का उपयोग होता है (फसली वर्ष में लगभग 592–593 वर्ष जोड़ने पर ईस्वी वर्ष ज्ञात होता है)।
रिकॉर्ड रूम का खेल:-
1380 फसली तक कोतवाली थाने के सामने स्थित आराजी संख्या 589 का कुल रकबा 36 डिसमिल 8 कड़ी दर्ज था। इस पर इमामबाड़ा स्टेट के सज्जादानशीन वाजिद अली शाह का नाम दर्ज था।
बाद में आराजी संख्या 589 और आसपास की जमीनों पर जकिया अली शाह, अजहर अली शाह, नाजमा अली शाह और अदनान फर्रुख अली शाह के नाम बतौर वारिसान दर्ज हुए।
1381 फसली में तीन फाड़: कैसे बंटी आराजी संख्या 589
वर्ष 1381 फसली में आराजी संख्या 589 का विभाजन कर इसे तीन हिस्सों में बांट दिया गया:
आराजी संख्या 589: रकबा 0.040 हे. (10 डिसमिल) – केवल इतना हिस्सा कब्रिस्तान के नाम बचा।
आराजी संख्या 583 मि.: रकबा 0.062 हे. (15-1/2डिसमिल) – रास्ता व मकानात में दर्ज हुआ।
आराजी संख्या 585 मि.: रकबा 0.040 हे. (10 डिसमिल) – 'जिम्मन 8' के जरिए सफीउल्लाह और साईदुल्लाह के नाम दर्ज किया गया।
इस प्रकार, 36 डिसमिल 8 कड़ी में से कब्रिस्तान के पास महज 10 डिसमिल रकबा बचा और बाकी 26 डिसमिल 8 कड़ी जमीन रास्तों, मकानों और निजी नामों पर चली गई।
गायब दस्तावेज और बेअसर कानूनी लड़ाइयां-
इस बंटवारे को लेकर स्थानीय स्तर पर आपत्तियां दर्ज हुईं और अदालत का दरवाजा भी खटखटाया गया, लेकिन सफीउल्लाह और साईदुल्लाह का नाम निरस्त नहीं हो सका। पड़ताल में तीन बेहद अहम पहलू ये सामने आया कि संबंधित परिवार का राजस्व रिकॉर्ड रूम तक सीधा दखल था।
आराजी संख्या 589 के इस बंदरबांट पर तत्कालीन जमींदार ने कभी कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 1381 फसली में जिस कथित जमींदारी दस्तावेज के आधार पर यह नाम दर्ज हुए, वह मूल दस्तावेज हमको राजस्व रिकॉर्ड में देखने को नही मिला।
ताजा स्थिति: वर्तमान में कब्रिस्तान की इस विवादित भूमि पर व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स का निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ा। स्थानीय विरोध के बाद अदालत से निर्माण पर स्थगन (Stay) भी मिला था, लेकिन कानूनी दांव-पेचों के बीच रोक हटने या उसकी अनदेखी के चलते मौके पर दो छतें पड़ चुकी हैं और बहुमंजिला इमारत बन चुकी है।
