Hot Posts

6/recent/ticker-posts

क्या बिखर रहा है निषाद पार्टी का कुनबा? 2022 में 11 विधायक, अब अपनों से ही बढ़ी दूरी की चर्चा...

रेगुलर अपडेट और ताजी खबरों के लिए हमारे व्हाट्सएप ग्रुप यूट्यूब चैनल को ज्वाइन करे

https://www.aaptaknews.in/?m=1

https://whatsapp.com/channel/0029VayBqc0LikgHssxrmC2O

https://www.instagram.com/aaptaknews08?igsh=eW00NzhnYW1xOHc0

https://youtube.com/@aaptaknews-08?si=-GNoQ38LhY_MLAxf

लाइव आप तक न्यूज़ से सम्पादक की ख़ास ख़बर

क्या बिखर रहा है निषाद पार्टी का कुनबा? 2022 में 11 विधायक, अब अपनों से ही बढ़ी दूरी की चर्चा

गोरखपुर उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी तेजी से उभरकर निषाद समाज की आवाज बनने वाली निषाद पार्टी अब खुद अपने ही राजनीतिक अस्तित्व को लेकर सवालों के घेरे में नजर आ रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन के साथ मैदान में उतरी निषाद पार्टी के 11 प्रत्याशी विधानसभा पहुंचे थे। पार्टी के छह विधायक उसके अपने चुनाव चिन्ह पर, जबकि पांच भाजपा के सिंबल पर चुनाव जीते थे।

लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के भीतर कथित असंतोष की खबरों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। गोरखपुर से प्रकाशित खबर में पांच विधायकों के पार्टी हाईकमान से नाराज होने और पार्टी कार्यक्रमों से दूरी बनाए जाने की चर्चा है। यदि यह असंतोष वास्तव में गहराता है तो सवाल सिर्फ पांच विधायकों का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक मॉडल का है जिसने निषाद पार्टी को महज कुछ वर्षों में प्रदेश की प्रभावशाली सहयोगी पार्टियों में ला खड़ा किया था।

क्या 2022 वाला जादू अब बरकरार है?

2022 में निषाद पार्टी के लिए माहौल अलग था। पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन कर 11 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की और संजय निषाद ने इसे पांच वर्षों में पार्टी के एक से 11 तक पहुंचने की बड़ी उपलब्धि बताया था।

आज तस्वीर में एक दूसरा पहलू भी दिखाई दे रहा है। भाजपा के साथ गठबंधन जारी है, लेकिन 2027 की सीटों और राजनीतिक प्रभाव को लेकर सहयोगी दलों के बीच दावेदारी तेज हो चुकी है। संजय निषाद लगातार अपने समाज के राजनीतिक प्रभाव का हवाला देते हुए अधिक हिस्सेदारी की बात कर रहे हैं। दूसरी ओर, हालिया राजनीतिक विश्लेषणों में भाजपा के भीतर निषाद समाज के नए चेहरों को उभारने की संभावनाओं की चर्चा भी सामने आई है।

सबसे बड़ा सवाल—आरक्षण का क्या हुआ?

निषाद पार्टी के राजनीतिक आंदोलन की सबसे बड़ी बुनियाद निषाद समाज को आरक्षण और एससी वर्ग में शामिल कराने की मांग रही है। पार्टी के गठन और उसके आंदोलन को इसी मुद्दे से राजनीतिक ऊर्जा मिली। लेकिन वर्षों बाद भी यह मांग पूरी नहीं हुई है।

दिलचस्प यह है कि अगस्त 2026 में खुद संजय निषाद ने आरक्षण के मुद्दे पर सरकार को फिर चेतावनी दी और कहा कि जरूरत पड़ी तो मंत्री पद तक छोड़ने से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने निषाद समुदाय को एससी श्रेणी में शामिल करने और मौजूदा ओबीसी हिस्से से संबंधित मांग भी दोहराई।

यहीं से सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल पैदा होता है कि क्या जिस आरक्षण के मुद्दे ने निषाद पार्टी को जन्म दिया था, उसी मुद्दे पर लंबे इंतजार ने अब उसके समर्थकों के बीच मोहभंग पैदा करना शुरू कर दिया है?

क्या विधायकों का भी पार्टी से मोहभंग हो रहा है?

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि निषाद पार्टी के विधायक बड़े पैमाने पर पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं या उन्हें 2027 में हार का डर सताने लगा है। इसके ठोस सार्वजनिक प्रमाण अभी सामने नहीं हैं। लेकिन यदि पार्टी के विधायकों की नाराजगी और कार्यक्रमों से दूरी की खबरें लगातार सामने आती हैं तो इसे महज व्यक्तिगत असंतोष मानकर नजरअंदाज करना भी आसान नहीं होगा।

क्योंकि चुनाव से पहले किसी क्षेत्रीय दल के लिए सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है, जब कार्यकर्ता सवाल पूछने लगें, विधायक दूरी बनाने लगें और नेतृत्व को बार-बार अपने सामाजिक आधार को एकजुट करने के लिए नए अभियान चलाने पड़ें।

संजय निषाद के सामने असली चुनौती

संजय निषाद के सामने चुनौती केवल भाजपा से सीटों का समझौता करने की नहीं है। असली चुनौती यह साबित करने की है कि निषाद पार्टी आज भी निषाद समाज की राजनीतिक जरूरत है या उसका प्रभाव केवल गठबंधन की सीटों तक सीमित होकर रह गया है।

2027 का चुनाव इस सवाल का जवाब देगा कि 2022 में 11 विधायकों तक पहुंची निषाद पार्टी का जनाधार वास्तव में मजबूत हुआ है या पांच साल की सत्ता की राजनीति के बाद उसके मूल सामाजिक आंदोलन की धार कमजोर पड़ी है।

क्या निषाद समाज अब भी निषाद पार्टी के साथ उसी मजबूती से खड़ा है? क्या आरक्षण की मांग पूरी न होने से मतदाताओं में नाराजगी है? क्या विधायक पार्टी के भविष्य को लेकर आशंकित हैं? या फिर यह सब चुनाव से पहले दबाव बनाने की रणनीति भर है?