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ब्रेकिंग न्यूज़ गोरखपुर
इन दो माताओं को सिर्फ छत नहीं… आपका अपनापन चाहिए
गोरखपुर किसी माँ के लिए इससे बड़ा दर्द क्या होगा कि वह अपने ही घर का पता बताने में असमर्थ हो जाए…
और किसी के जीवन की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि माता-पिता के जाने के बाद वह दुनिया में बिल्कुल अकेली रह जाए…!
14 सितंबर 2026 को ऐसी ही दो बेसहारा माताओं ने नगर निगम गोरखपुर के सहयोग से मातृ आंचल सेवा संस्थान द्वारा संचालित अम्मा आश्रय निकेतन में कदम रखा।
बेबी खातून, उम्र लगभग 20–25 वर्ष, को शाहपुर थाना पुलिस द्वारा आश्रम पहुंचाया गया। मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण वह अपना पूरा पता नहीं बता पा रही हैं। बस इतना कहती हैं—“मेरा घर मेडिकल कॉलेज के आगे है…”
परिजनों की तलाश के प्रयास किए गए, लेकिन अभी तक कोई अपना नहीं मिल पाया।
हुमा खातून, उम्र लगभग 40–45 वर्ष, को तिवारीपुर थाना क्षेत्र से उनके रिश्तेदार आश्रम लेकर पहुंचे। उनके माता-पिता का देहांत हो चुका है। भाभी हैं,पर रखना नहीं चाहती।वह अकेली और बेसहारा अवस्था में थी और मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण अपने जीवन की पूरी कहानी भी नहीं बता पा रही हैं।
आज इन दोनों माताओं का कोई अपना नहीं है…
लेकिन अब अम्मा आश्रय निकेतन उनका अपना घर है।
यहाँ उन्हें भोजन मिलेगा, कपड़े मिलेंगे, इलाज मिलेगा, सुरक्षा मिलेगी…
लेकिन इन सबसे बढ़कर उन्हें चाहिए किसी का साथ, किसी की बातचीत और किसी के हाथ का स्पर्श।
आपसे एक छोटी-सी विनती है…
कभी समय निकालकर अम्मा आश्रय निकेतन आइए।
इन माताओं के पास कुछ देर बैठिए।
इनका हाथ पकड़कर पूछिए—
“मैया, कैसी हो?”
शायद वे ठीक से जवाब न दे पाएं…
शायद अपनी कहानी न बता पाएं…
लेकिन यकीन मानिए, आपका कुछ मिनट उनके साथ बैठना उनके लिए बहुत मायने रख सकता है।
हम अक्सर मंदिरों में भगवान को खोजते हैं…
कभी-कभी किसी बेसहारा माँ के पास बैठकर भी देखिए।
शायद वहाँ आपको इंसानियत का सबसे सुंदर रूप दिखाई दे।
अम्मा आश्रय निकेतन में रहने वाली माताओं की सेवा समाज के सहयोग से ही संभव हो रही है। भोजन, दवाइयाँ, कपड़े, दैनिक आवश्यकताएँ और अन्य खर्च लगातार चलते रहते हैं।
आप धन से सहयोग कर सकते हैं, सामग्री से सहयोग कर सकते हैं या अपना समय देकर सहयोग कर सकते हैं।
छोटा सहयोग भी हमारे लिए छोटा नहीं होता।
क्योंकि जब कई हाथ जुड़ते हैं, तभी किसी बेसहारा माँ के जीवन में “अपना घर” बना रहता है।
आइए… इन माताओं से मिलने जरूर आइए।
इनकी बातें सुनिए।
इनका दर्द समझिए।
इनके साथ कुछ पल बिताइए।
और इस सेवा परिवार का हिस्सा बनिए।
“जिसका कोई नहीं, उसके
