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लाइव आप तक न्यूज़ से सम्पादक की ख़ास ख़बर
“मैं गोरखपुर आकाशवाणी से उदिता श्रीवास्तव बोल रही हूं…” अब हमेशा के लिए खामोश हो गई वह ममता भरी आवाज
उदिता बुआ के जाने से सूना हो गया शीश महल, यादों में रह गई स्नेह, अपनत्व और दुलार की अनमोल विरासत आकाशवाणी के स्टूडियो से लेकर पत्रकारिता की गुफ्तगू तक, हर मुलाकात में छलकता था उनका अपनापन
“तुम्हारे अंदर की ऊर्जा तुम्हें बहुत आगे ले जाएगी” कहकर हौसला बढ़ाने वाली बुआ की बातें अब यादों में रुलाएंगी
गोरखपुर “मैं गोरखपुर आकाशवाणी से उदिता श्रीवास्तव बोल रही हूं…” कभी रेडियो पर सुनाई देने वाले इन शब्दों में एक अलग ही मिठास, अपनापन और आत्मीयता हुआ करती थी। लेकिन आज वही जानी-पहचानी आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। उदिता श्रीवास्तव के दुनिया से रुखसत होने की खबर ने दिल को झकझोर कर रख दिया। ऐसा लगा, जैसे जिंदगी के किसी अपने पन्ने को किसी ने अचानक फाड़कर अलग कर दिया हो। अब न वह आवाज सुनाई देगी, न वह स्नेहिल मुस्कान दिखाई देगी और न ही वह अपनापन मिलेगा, जो हर मुलाकात को यादगार बना देता था।
थाना तिवारीपुर के अंतर्गत शीश महल, जाफरा बाजार से जुड़ीं उदिता श्रीवास्तव केवल आकाशवाणी की जानी-पहचानी आवाज ही नहीं थीं, बल्कि रिश्तों को दिल से निभाने वाली ऐसी शख्सियत थीं, जिनकी मौजूदगी मोहल्ले के लोगों के लिए किसी बड़े सहारे से कम नहीं थी। वह छोटे काजीपुर निवासी वरिष्ठ पत्रकार बाबू मुन्ना लाल श्रीवास्तव की बहू और वरिष्ठ पत्रकार दिनेश चन्द्र श्रीवास्तव की धर्मपत्नी थीं। उनका मायका शीश महल में था। पत्रकार एवं एडवोकेट दिनेश श्रीवास्तव अपने परिवार के साथ यहीं रहने लगे थे। इसी रिश्ते की आत्मीयता ने उन्हें मोहल्ले के बच्चों के लिए ‘बुआ जी’ और दिनेश श्रीवास्तव को ‘फूफा जी’ बना दिया था।
रिश्ते खून से नहीं, स्नेह से भी बनते हैं…
मोहल्ले के बच्चे उन्हें बड़े प्यार और अदब से बुआ जी कहकर पुकारते थे। मैं भी उन्हें पूरे सम्मान और आत्मीयता के साथ बुआ कहता था। बुआ और फूफा दोनों का स्नेह हमेशा मिलता रहा। वे अपने कामों में भी मुझे याद किया करते थे। उनके साथ बैठना, बातें करना और पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं पर गुफ्तगू करना जीवन के उन खूबसूरत अनुभवों में शामिल है, जिन्हें वक्त भी दिल से मिटा नहीं सकता।
शीश महल की गलियों में इन दोनों महान हस्तियों की मौजूदगी अपने आप में गर्व और भरोसे का एहसास कराती थी। उनके व्यक्तित्व में अनुभव की गहराई थी, बातों में अपनापन था और व्यवहार में ऐसा बड़प्पन, जो उम्र या पद का मोहताज नहीं होता। वे केवल परिवार के सदस्य नहीं थे, बल्कि सामाजिक जीवन और पत्रकारिता के क्षेत्र में मार्गदर्शन देने वाले अभिभावक भी थे। आज जब दोनों इस दुनिया से विदा हो चुके हैं, तो ऐसा लगता है कि मोहल्ले से स्नेह की एक पूरी छांव उठ गई है। अब उनकी जगह कोई नहीं भर सकता।
आकाशवाणी का स्टूडियो और बुआ की आंखों में चमकती खुशी…
जब मैं अपने बड़े भाई एवं शीश महल दरगाह के गद्दीनशीं सज्जाद अली रहमानी के साथ आकाशवाणी गोरखपुर के स्टूडियो जाता था, तो बुआ जी की खुशी देखते ही बनती थी। ऐसा महसूस होता था, मानो परिवार के किसी अपने को आगे बढ़ते देखकर उनके मन में खुशियों का सैलाब उमड़ आया हो। उनकी आत्मीयता और प्रोत्साहन ने मुझे भी शेरो-शायरी प्रस्तुत करने का अवसर दिलाया। मेरे लिए यह केवल रेडियो के स्टूडियो तक पहुंचने का अनुभव नहीं था, बल्कि बुआ के स्नेह और विश्वास से जुड़ी एक अनमोल याद थी।
वह अक्सर मुझसे कहा करती थीं, “तुम्हारे अंदर की ऊर्जा तुम्हें बहुत आगे लेकर जाएगी।” उस समय मैं उनकी इस बात की गहराई को शायद उतना नहीं समझ पाता था, जितना आज उनके जाने के बाद महसूस कर रहा हूं। अब जब उनकी कही बातें याद आती हैं, तो दिल भर आता है। काश! आज वह सामने होतीं, एक बार फिर वही शब्द कहतीं और मैं मुस्कुराकर उनकी बात सुन लेता। लेकिन जिंदगी में कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जिनके खामोश हो जाने के बाद इंसान उम्र भर उन्हें सुनने के लिए तरसता रहता है।
अब यादों में ही मिलेंगी उदिता बुआ…
उदिता श्रीवास्तव का जाना केवल एक परिवार की क्षति नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए भी गहरा आघात है, जिन्हें उनके स्नेह, मार्गदर्शन और आत्मीयता का सौभाग्य मिला। उनके शुभचिंतकों और परिचितों के लिए यह स्वीकार करना आसान नहीं कि अब वह हमारे बीच नहीं हैं। वरिष्ठ पत्रकारों और सामाजिक लोगों के साथ बैठकों में होने वाली चर्चाएं, पत्रकारिता की गुफ्तगू और रिश्तों को जोड़कर रखने वाला उनका स्वभाव हमेशा याद आएगा।
आज मन बार-बार अतीत की उन्हीं गलियों में लौट जाता है, जहां बुआ और फूफा का स्नेह मिला करता था। वक्त आगे बढ़ जाएगा, मोहल्ले की जिंदगी भी अपनी रफ्तार से चलती रहेगी, लेकिन दिल के भीतर एक खालीपन हमेशा बना रहेगा। कभी आकाशवाणी की आवाज में, कभी शीश महल की गलियों में और कभी पत्रकारिता से जुड़ी किसी चर्चा में उनकी याद अचानक सामने आकर आंखों को नम कर देगी।
कुछ लोग दुनिया से चले जाते हैं, मगर दिल से कभी विदा नहीं होते। उदिता बुआ भी उन्हीं लोगों में से एक थीं। उनकी यादें मेरे दिलो-दिमाग में हमेशा रची-बसी रहेंगी। आज उनके लिए शब्द लिखते हुए भी मन भारी है और आंखें नम हैं। जिस आवाज ने कभी दूसरों के घरों तक अपनापन पहुंचाया, आज उसी आवाज की याद हमारे दिलों में एक गहरी टीस बनकर रह गई है।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह शोकाकुल परिवार को इस असहनीय दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। उदिता श्रीवास्तव की आत्मा को शांति दें और उनके परिवार, शुभचिंतकों तथा उनसे स्नेह रखने वाले सभी लोगों को धैर्य और संबल प्रदान करें।
अलविदा उदिता बुआ!
आपकी आवाज भले ही खामोश हो गई हो, लेकिन आपका स्नेह, आपका विश्वास और आपके कहे हुए शब्द कभी खामोश नहीं होंगे। आप यादों में थीं, यादों में हैं और हमेशा यादों में रहेंगी।
उदिता बुआ आपको भावभीनी श्रद्धांजलि एवं अश्रुपूरित नमन।
